शास्त्रों में नंबर 13 अशुभ, फिर साल में क्यों जुड़ा ये अधिकमास? पुरुषोत्तम महीने का हरदोई से सीधा कनेक्शन

प्राचीन काल से 13 को अशुभ माना गया है, फिर भी वर्ष में 13वां अधिकमास क्यों होता है? इसका रहस्य हिरण्यकश्यपु के वरदान और नृसिंह अवतार से जुड़ा है. ब्रह्मा से अमरता का वरदान पाकर हिरण्यकश्यपु बेलगाम हो गया था. भगवान नारायण ने 13वें महीने, अधिकमास का प्रावधान कर, हरदोई में नृसिंह रूप में उसका वध किया और सृष्टि को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई.

प्रहलाद घाट हरदोई Image Credit:

वैसे तो प्राचीन काल से ही नंबर 13 को अशुभ माना गया है. इस नंबर को लेकर शास्त्रों में भी कई प्रसंग मिलते हैं. बावजूद इसके, सवाल अक्सर उठते हैं कि अधिकमास के रूप में साल का तेरहवां महीना क्यों है? इसी के साथ सवाल यह भी कि इस महीने में सभी मांगलिक कार्य बंद होते हैं, फिर भी इसे परम पवित्र क्यों कहा गया? इस महीने को पुरुषोत्तम मास की संज्ञा क्यों दी गई? हालांकि इन सभी सवाल के जवाब भी कई पौराणिक ग्रंथों में मिल जाते हैं. दरअसल इसके पीछे सतयुग में हिरण्यकश्यपु को परम पिता ब्रह्मा के आर्शिवाद और इसी में छिपी हिरण्यकश्यपु वध की कहानी है.

आइए, सीधे कहानी पर चलते हैं. दरअसल राक्षसराज हिरण्यकश्यपु ने ब्रह्मा की खूब तपस्या की थी. उसकी तपस्या से ब्रह्मा प्रसन्न हुए और मनवांछित वरदान दिया था. वरदान में हिरण्यकश्यपु ने भगवान से अमरता का डिमांड किया, लेकिन ब्रह्मा ने कहा कि सृष्टि में जो कोई भी जन्म लेता है, उसे एक ना एक दिन मरना ही पड़ता है. यह सुनकर हिरण्यकश्यपु ने कहा कि यदि उसे मरना है तो इसके लिए कुछ शर्तें होनी चाहिए. उसने भगवान ब्रह्मा के सामने अपनी शर्तें रखीं और भगवान ने उन शर्तों को स्वीकार कर लिया था.

ये थीं शर्तें

हिरण्यकश्यपु को ब्रह्मा ने वरदान में मंजूरी दे दी थी कि उसका वध न दिन में होगा और ना रात में, न घर में होगा और न ही बाहर, न जमीन पर होगा और ना ही आसमान में. इसके अलावा साल के 12 महीनों में से भी किसी महीने उसकी मौत नहीं हो सकती थी. इन शर्तों पर ब्रह्मा के तथास्तु के बाद हिरण्यकश्यपु बेलगाम हो गया. उसने इस कदर उत्पात काटा कि देवता भी भयाक्रांत हो गए.

सभी देवता भागे-भागे ब्रह्मा के पास गए, राहत की मांग की, लेकिन ब्रह्मा ने कह दिया कि अब मामला उनके हाथ से निकल चुका है. उन्हें जो कहना था, कह दिया. अब तो भगवान नारायण ही कुछ कर सकते हैं. इसके बाद सभी देवता भगवान नारायण के पास गए. फिर भगवान ने देवताओं को आश्वस्त किया और फिर नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यपु का वध किया था.

खुद भगवान बन बैठा था हिरण्यकश्यपु

पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक ब्रह्मा के बाद हिरण्यकश्यपु खुद भगवान बन बैठा था. उसने मृत्यु लोक में होने वाले यज्ञ हवनादि में देवताओं को भाग देने पर प्रतिबंध लगा दी. अनिवार्य कर दिया कि पूजा होगी तो केवल उसी की होगी. यहां तक कि उसने अपने बेटे प्रहलाद को भी बहुत प्रताड़ित किया. फिर प्रहलाद के आह्वान पर भगवान धरती पर नृसिंह रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा के आर्शिवाद के मुताबिक ही उसका वध किया था. इसके लिए शाम को गोधुलि बेला में अपनी जांघों पर रखकर अपने लंबे नाखून से फाड़ दिया था.

इसलिए बना अधिकमास

पौराणिक कथाओं के मुताबिक चूंकि हिरण्यकश्यपु का वध साल के 12 महीनों में नहीं हो सकती थी, इसलिए वह एक तरह से अमर ही था. ऐसे में भगवान नारायण की प्रेरणा से सप्तऋषियों ने 13वें महीने अधिकमास का प्रावधान किया और इसी प्रावधान का लाभ उठाते हुए भगवान नारायण ने दुष्ट हिरण्यकश्यपु के संताप से सृष्टि की रक्षा की थी. मान्यता है कि हिरण्यकश्यपु का राजभवन उत्तर प्रदेश के हरदोई में था. इसलिए उसके वध के लिए भगवान नारायण भी इसी हरदोई में अवतरित हुए थे. इसलिए हरदोई को भगवान नृसिंह की धरती भी कहा जाता है.

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