बहुसंख्यकवादी विचारधारा ने कानूनी वैधता को प्रभावित किया… अयोध्या फैसले पर जमीयत की रिपोर्ट

जमीयत उलमा-ए-हिंद ने बाबरी मस्जिद फैसले और पूजा स्थल अधिनियम पर एक रिपोर्ट जारी की है. इसमें दावा किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट का बाबरी मस्जिद फैसला यह दर्शाता है कि बहुसंख्यकवादी विचारधारा ने कानूनी वैधता में गहरी पैठ बना ली है. साथ ही यह पूजा स्थल अधिनियम को मजबूत करने की सिफारिश करती है.

जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद (फाइल फोटो) Image Credit:

जमीयत उलमा-ए-हिंद ने बाबरी मस्जिद फैसले और पूजा स्थल अधिनियम पर एक रिपोर्ट जारी की है. इसमें बहुसंख्यकवाद पर सवाल और पूजा स्थल अधिनियम पर जोर दिया गया. साथ ही इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट का बाबरी मस्जिद फैसला यह दर्शाता है कि बहुसंख्यकवादी विचारधारा ने कानूनी वैधता में गहरी पैठ बना ली है.

जमीयत की यह रिपोर्ट, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के भोजशाला विवाद में हालिया फैसले के एक दिन बाद जारी की गई है. जिसमें भोजशाला-कमल मौला मस्जिद कॉम्प्लेक्स को सरस्वती मंदिर घोषित किया गया है. वहीं, इस फैसले को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पूजा स्थल अधिनियम की भावना के सीधे खिलाफ करार दिया है.

पूजा स्थल कानून धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए अहम

जमीयत द्वारा जारी ‘बाबरी मस्जिद फैसले और पूजा स्थल अधिनियम 1991 के मामले का एक आलोचनात्मक विश्लेषण’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में इस्माइल फारूकी मामले और अयोध्या फैसले सहित सुप्रीम कोर्च के प्रमुख निर्णयों का विश्लेषण किया गया है. इसके लिए नई दिल्ली में कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसकी अध्यक्षता मौलाना महमूद मदनी ने की.

रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने, धार्मिक सन्भ्राव और संवैधानिक स्थिरता की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, ताकि ऐतिहासिक विवादों को फिर हवा न दी जा सके. रिपोर्ट में पूजा स्थल अधिनियम का सख्ती से कार्यान्वयन और धार्मिक समानता के सिद्धांतों को और मजबूत करने पर जोर दिया गया.

‘जैसे-जैसे न्यायपालिका हिंदुत्व बहुसंख्यकवाद को…’

इस रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों, विशेष रूप से इस्माइल फारूकी मामले (1994) और एम. सिद्दीकी (अयोध्या निर्णय 2019) का विश्लेषण किया गया. साथ ही यह तर्क दिया गया है कि इस्माइल फारूकी मामले में मस्जिद को इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं मानने वाली व्याख्या ने बाद के मामलों पर गहरा प्रभाव डाला है.

इसमें यह भी कहा गया है, ‘जैसे-जैसे न्यायपालिका हिंदुत्व बहुसंख्यकवाद को अधिकाधिक समायोजित कर रही है, मुस्लिम पवित्र स्थल कानूनी रूप से असुरक्षित, सांस्कृतिक रूप से विवादित और राजनीतिक रूप से लक्षित हो गए हैं.’ साथ ही दावा किया गया है कि कुछ न्यायिक व्याख्याएं धार्मिक स्थलों से संबंधित संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर कर दिया है.

बाबरी मस्जिद, मंदिर तोड़कर नहीं बना- मौलाना मदनी

कार्यक्रम के बाद, जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा कि बाबरी मस्जिद फैसले पर एक गंभीर और गहन अध्ययन की अत्यंत आवश्यक थी ताकि भावी पीढ़ियां यह देख सकें कि एक वर्ग इस फैसले को एक अलग नजरिए से देखते हुए अपने पक्ष को विद्वतापूर्ण और संवैधानिक तरीके से दुनिया के सामने प्रस्तुत किया.

मौलाना मदानी ने कहा कि यह रिपोर्ट वास्तव में भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का एक गंभीर और ईमानदार प्रयास है. बाबरी मस्जिद मामले में कहीं भी यह साबित नहीं हुआ कि मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को ध्वस्त करके किया गया था, सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि इस दावे के पक्ष में कोई सबूत नहीं है.

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