काशी में BJP की नई ओबीसी पॉलिटिक्स, पिछड़ों के हाथ में तीनों अहम पद
भारतीय जनता पार्टी ने नई प्रदेश कार्यकारिणी में अशोक चौरसिया को काशी क्षेत्र का क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है. काशी क्षेत्र की 71 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाले इस पद पर नियुक्ति को भाजपा की पिछड़ा वर्ग केंद्रित रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. वाराणसी में पहले से प्रदीप अग्रहरि और राम सकल पटेल जैसे ओबीसी नेताओं को जिम्मेदारी दी जा चुकी है.
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उत्तर प्रदेश में नई प्रदेश कार्यकारिणी और क्षेत्रीय अध्यक्षों की घोषणा कर दी है. पार्टी की नई संगठनात्मक संरचना में सबसे अधिक चर्चा काशी क्षेत्र को लेकर हो रही है, जहां बीजेपी ने संगठन के तीनों प्रमुख पदों पर पिछड़े वर्ग के नेताओं को जिम्मेदारी सौंपकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. बीजेपी ने वरिष्ठ संगठनकर्ता अशोक चौरसिया को काशी क्षेत्र का क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया है.
काशी क्षेत्र के अंतर्गत 16 जिले और 71 विधानसभा सीटें आती हैं. ऐसे में यह जिम्मेदारी न केवल संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं. अशोक चौरसिया की पहचान बीजेपी में एक जमीनी कार्यकर्ता और संगठन को बारीकी से समझने वाले नेता की है. वह पिछले करीब 12 वर्षों से काशी क्षेत्र में क्षेत्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. इसके अलावा जौनपुर के संगठन प्रभारी के रूप में भी काम किया है.
कौन हैं अशोक चौरसिया?
संगठन के भीतर नए और पुराने कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की उनकी क्षमता को उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है. बरई (चौरसिया) समाज से आने वाले अशोक चौरसिया शिक्षा और व्यवसाय दोनों क्षेत्रों में सक्रिय हैं. ‘संकल्प ट्यूटोरियल’ नाम से उनका कोचिंग संस्थान भी संचालित होता है और वे एक सफल व्यवसायी के रूप में भी जाने जाते हैं.
पिछड़े वर्ग को तीनों बड़ी जिम्मेदारियां
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बीजेपी ने पहले ही प्रदीप अग्रहरी को महानगर अध्यक्ष और राम सकल पटेल को जिला अध्यक्ष बनाया है. अब अशोक चौरसिया को क्षेत्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर पार्टी ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले समय में पिछड़ा वर्ग उसकी राजनीतिक रणनीति का केंद्र रहने वाला है. काशी क्षेत्र, वाराणसी महानगर और वाराणसी जिला— तीनों प्रमुख संगठनात्मक इकाइयों की कमान अब पिछड़े वर्ग के नेताओं के हाथ में है.
क्या पीडीए की काट है बीजेपी की नई रणनीति?
काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष अरुण मिश्रा का मानना है कि बीजेपी का यह कदम समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की रणनीतिक काट के रूप में देखा जा सकता है, लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को जिन सामाजिक वर्गों में अपेक्षित समर्थन नहीं मिला, उनमें पिछड़े वर्ग की कुछ छोटी जातियां भी शामिल थीं, ऐसे में पार्टी संगठन में उन्हें प्रतिनिधित्व देकर अपने सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
अरुण मिश्रा कहते हैं कि अशोक चौरसिया संगठन के अनुभवी खिलाड़ी हैं, उन्होंने वर्षों तक क्षेत्रीय महामंत्री के रूप में काम किया है और बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संवाद है. ऐसे नेताओं को आगे लाकर बीजेपी संगठन और सामाजिक समीकरण दोनों को साधने की कोशिश कर रही है.
संख्या कम, लेकिन संदेश बड़ा
दिलचस्प बात यह है कि बरई या चौरसिया समाज पूर्वांचल में बहुत बड़ी संख्या वाला वोट बैंक नहीं माना जाता. वाराणसी में इस समाज के करीब 50 हजार मतदाता बताए जाते हैं. मिर्जापुर और बनारस को छोड़ दिया जाए तो पूर्वांचल के अधिकांश जिलों में इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है. इसके बावजूद अशोक चौरसिया को इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
