‘उनका चेहरा भी नहीं दिखाया’, वाराणसी कस्टोडियल डेथ केस में 29 साल बाद न्याय, मृतक की पत्नी बोली- सब कुछ चला गया
5 फरवरी 1997 को अपने छोटे बेटे के लिए दवा लेने निकले राजेंद्र सिंह की एक सहयात्री से सीट को लेकर झगड़ा हो गया था. सहयात्री दयाराम ने राजेंद्र सिंह पर चोरी का इलज़ाम लगा दिया.सुंदरपुर के पास झगड़ा शुरू हो गया. पास ही सुंदरपुर चौकी थी. नरेंद्र प्रताप सिंह चौकी इंचार्ज और राधेश्याम सिंह सब इंस्पेक्टर ने राजेंद्र सिंह को हिरासत में ले लिया. लेकिन हिरासत के दौरान ही राजेंद्र सिंह की मौत हो गई. अब इस मामले में कोर्ट ने पुलिस के दो दरोगाओं को टॉर्चर का दोषी और एक डॉक्टर को उनका साथ देने के लिए जेल की सजा सुनाई है.
वाराणसी जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर है बखरिया गांव. इसी गांव में राजेंद्र सिंह पत्नी शशिमा देवी और दो बच्चों के साथ रहते थे. खेती बाड़ी की थोड़ी बहुत जमीन थी और प्राइवेट नौकरी कर के राजेंद्र सिंह अपना परिवार चला रहे थे. 22 जनवरी 1997 को शशिमा देवी ने अपने छोटे बेटे आकाश को जन्म दिया था.
वो 5 फरवरी की सुबह थी जब राजेंद्र सिंह अपने छोटे बेटे के लिए दवा लेने के लिए घर से निकले. अपनी पत्नी शशिमा देवी से ये कहकर कि सुसुवाही से आकाश के लिए दवा लेकर आ रहा हूं. गांव से निकलकर राजेंद्र सिंह महानगरी (तब सिटी बस को इसी नाम से जाना जाता था )पकड़ कर बीएचयू के लिए रवाना हुए.
सहयात्री से बस की सीट के लिए झगड़ा हो गया था
बस में ही एक सहयात्री से उनका सीट को लेकर झगड़ा हो गया. सहयात्री दयाराम ने राजेंद्र सिंह पर चोरी का इलज़ाम लगा दिया.सुंदरपुर के पास झगड़ा शुरू हो गया. पास ही सुंदरपुर चौकी थी. नरेंद्र प्रताप सिंह चौकी इंचार्ज और राधेश्याम सिंह सब इंस्पेक्टर ने राजेंद्र सिंह को हिरासत में ले लिए.
पति का चेहरा तक नहीं देखने दिया
हिरासत में लेते समय राजेंद्र सिंह के ही गांव बखरिया के कविन्द्र सिंह मौके पर थे. टीवी 9 से बात करते हुए मृतक की पत्नी शशिमा देवी फफक पड़ी.शशिमा देवी ने बताया कि कविन्द्र सिंह जब थोड़ी देर बाद सुंदर पुर चौकी पर पहुंचे तो चौकी वालों ने बताया कि उनको छोड़ दिया गया है. लेकिन आधे घंटे बाद चौकी वालों ने कविन्द्र सिंह से कहा कि उन्होंने अपने शॉल से पंखे से लटककर फांसी लगा लिए हैं.
शशिमा देवी ने बताया कि कविन्द्र सिंह को साथ में लेकर उनका पोस्टमॉर्टम हुआ और उसमें भी डॉक्टर को मिलाकर झूठी रिपोर्ट तैयार की गई कि उन्होंने फांसी लगाई है. जबकि चौकी में पंखा था ही नहीं. शशिमा देवी ने बताया कि कई घंटे बाद जब उनको पता चला तो अपनी बुआ के साथ वो लंका थाने पहुंची क्यूंकि चौकी पर तो कोई था ही नही. लंका थाने से पता चला कि उनको हरिशचंद्र घाट ले गए हैं. जब अपनी बुआ के साथ वहां हम पहुंचे तो पुलिस वाले उनका क्रियाकर्म के लौट रहे थे.
भईया, वो लोग हमको आखिरी समय में उनका चेहरा भी नही देखने दिए.
29 साल में सब बिक गया, बच्चे पढ़ नहीं पाएं
शशिमा देवी ने बताया कि जब पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया, तब हम इसे स्वीकार नहीं किया. फिर मानवाधिकार आयोग गए. जांच सीबीसीआईडी को दी गई. आज 29 साल बाद पुलिस दोषी करार दिए गए हैं. लेकिन इस 29 साल ने तो मेरा सब कुछ छीन लिया. जमीन बिक गई, खेत चला गया. बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाएं. कैसे पढ़ाते? दिमाग काम नहीं कर रहा था और कोई मदद करने वाला था नहीं, तो हम क्या करते?
शशिमा देवी ने आगे बताया कि उस दौरान एक बच्चा 2 साल का था. एक 15 दिन का. इन दो बच्चों के साथ पति के लिए न्याय की लड़ाई. और बीच-बीच में सुलह कराने के नाम पर हज़ारों रुपये की पेशकश करने वाले लोग. ये सब सोचकर अभी भी सिरहन होती है.29 साल बाद जो भी फ़ैसला आया है उससे इतनी राहत तो जरूर मिली है कि जो बात हम इतने साल से कहते आए हैं उसे कोर्ट ने भी माना.
शशिमा देवी बोलीं- मेरा सबकुछ चला गया
शशिमा देवी ने आगे कहा कि लेकिन क्या इसको न्याय कहेंगे? मुझे नही पता कि अभी लड़ाई कितनी बाकी है. मेरा तो सब चला गया. पांच किलो राशन पर जिंदा हूं. ना जमीन है न कोई रोज़गार का साधन. बच्चे जो कमाते हैं और जो कुछ काम गांव में मिल जाते हैं, उसी के सहारे ज़िंदगी चल रही है.
