राममंदिर में देख सकेंगे 300 साल पुरानी रामचरित मानस की पांडुलिपि, रामकथा संग्रहालय में रखी जाएगी ये धरोहर
अयोध्या के रामकथा संग्रहालय में जल्द ही 300 साल से भी पुरानी हाथ से लिखी रामचरितमानस पांडुलिपि रखी जाएगी. यह दुर्लभ धरोहर अमेठी के एक रामभक्त द्वारा सुरक्षित रखी गई थी, जिसकी ऐतिहासिकता की जांच जारी है. यह पांडुलिपि न केवल धार्मिक, बल्कि भाषाई दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्राचीन देवनागरी लिपि में है.
क्या आपने तुलसी दास द्वारा रचित श्रीराम चरित मानस की मूल पांडुलिपि देखी है, यदि नहीं तो बहुत जल्द ही आपका यह यह सपना पूरा होने वाला है. राम मंदिर अयोध्या के रामकथा संगहालय में इस पांडुलिप को स्थान मिलने वाला है. जहां देश विदेश से आने वाले रामभक्त सहज ही इस महान ग्रंथ के मूल स्वरुप को देख सकेंगे. करीब 300 वर्ष या इससे भी अधिक पुरानी यह पांडलिपि कुमारगंज अमेठी के रहने वाले एक रामभक्त सुरक्षित रखी हुई थी.
उन्होंने इस पांडुलिप को रामकथा संग्रहालय में सुरक्षित करने का आग्रह किया था. इसके बाद संग्रहालय प्रशासन ने इस पांडुलिपि की जांच पड़ताल शुरू कर दी है. बताया जा रहा है कि यदि यह पांडुलिपि वास्तव में 300 साल पुरानी हुई तो रामकथा संग्रहालय के लिए यह एक दुर्लभ धरोहर होगी. इस संग्रहालय में ‘पांडुलिपि संरक्षण यज्ञ’ अभियान चल रहा है. इस अभियान के तहत देश-विदेश में बिखरे भगवान राम से जुड़े प्रतीकों और हस्तलिखित पांडुलिपियों को सहेजा जा रहा है.
देवनागरी लिपि में है पांडुलिपि
कुमारगंज अमेठी के रहने वाले रामभक्त जगजीत सिंह के मुताबिक पीढ़ियों से यह अनमोल पांडुलिपि उनके घर में रखी थी. इसे सहेज कर रखने के लिए उन्होंने अब राममंदिर के रामकथा संग्रहालय से आग्रह किया था. उनके आग्रह को स्वीकार कर लिया गया है. जरूरी औपचारिकताओं के बाद इसे संग्रहालय में रखवा दिया जाएगा. उन्होंने बताया कि देवनागरी लिपि में इस पांडुलिपि को हाथ से लिखा गया है.
होगी ऐतिहासिकता की जांच
जगजीत सिंह के आग्रह पर संग्रहालय प्रशासन ने इस पांडुलिपि की प्रमाणिकता और ऐतिहासिकता की जांच शुरू कर दी है. पता किया जा रहा है कि यह पांडुलिपि कितनी पुरानी है और इसे किसने लिखा था. संग्रहालय के निदेशक डॉ . संजीव कुमार सिंह के मुताबिक जरूरी जांच पड़ताल के बाद ही इस पांडुलिपि को संग्रहालय में रखा जाएगा.
क्यों महत्वपूर्ण है यह पांडुलिपि?
जानकारी के मुताबिक संग्रहालय प्रशासन ने विशेषज्ञों से भी इस पांडुलिपि को लेकर बातचीत की है. बताया जा रहा है कि इस पांडुलिपि का धार्मिक महत्व तो है ही, भाषाई दृष्टि से भी यह दुर्लभ है. इस पांडुलिपि को प्राचीन देवनागरी लिपि में लिखा गया है. इससे भाषा विशेषज्ञ उस समय में अक्षरों की संरचना, उनकी बनावट और लेखन शैली का अध्ययन कर सकेंगे. कहा जा रहा है कि उस समय की देवनागरी लिपि और आज की देवनागरी लिपि में काफी अंतर है.