बरेली में 118 करोड़ का GST घोटाला बेनकाब, फर्जी फर्मों का खुलासा; गाजियाबाद से 2 गिरफ्तार

बरेली पुलिस ने 118 करोड़ के जीएसटी घोटाले का पर्दाफाश किया है. फर्जी फर्मों का नेटवर्क बनाकर करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी की गई. गाजियाबाद से दो मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. पुलिस ने लैपटॉप, मोबाइल और करोड़ों के साइन चेक बरामद किए हैं.

फ्रॉड ( प्रतीकात्मक तस्वीर) Image Credit:

बरेली पुलिस और साइबर थाना टीम ने करोड़ों रुपये के GST फर्जीवाड़े का खुलासा किया है. साथ ही गाजियाबाद में रहने वाले दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है. जांच में सामने आया है कि फर्जी फर्मों का नेटवर्क बनाकर करीब 118 करोड़ रुपये का फर्जी कारोबार दिखाया गया. इस पूरे खेल के जरिए सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान पहुंचाया गया.

एसपी क्राइम मनीष सोनकर ने बताया कि शुरुआती जांच में पीसी इंटरप्राइजेज नाम की फर्म के जरिए लगभग 20 करोड़ रुपये का फर्जी कारोबार दिखाया गया था. इसी के आधार पर करीब 1.28 करोड़ रुपये से अधिक का GST फ्रॉड सामने आया. जब जांच आगे बढ़ाई तो पता चला कि करीब एक दर्जन फर्जी फर्मों का इस्तेमाल कर 118 करोड़ का लेनदेन किया गया.

3.18 करोड़ रुपये के हस्ताक्षरित चेक बरामद

पुलिस के मुताबिक, 21 जुलाई को मालगोदाम रोड इलाके से गाजियाबाद निवासी योगेंद्र शर्मा और टिंपू को गिरफ्तार किया गया. आरोपी योगेंद्र मूल रूप से बुलंदशहर और टिंपू मध्य प्रदेश के दमोह का निवासी है. दोनों गाजियाबाद में रहकर इस गिरोह के साथ काम कर रहे थे. इसके खिलाफ फर्जी फर्मों के संचालन और टैक्स चोरी के का आरोप है.

गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से दो लैपटॉप, छह मोबाइल फोन, फर्जी आधार कार्ड, बैंक चेकबुक और 3.18 करोड़ रुपये से अधिक के हस्ताक्षरित चेक बरामद किए हैं. इसके अलावा एक लाल रंग की डायरी भी मिली है, जिसमें करोड़ों रुपये के लेनदेन का हिसाब दर्ज बताया जा रहा है. कई संदिग्ध फर्मों से जुड़े दस्तावेज भी हाथ लगे हैं.

लोगों को लालच देकर ऐसे करता था फर्जीवाड़ा

पुलिस के अनुसार, गिरोह पहले लोगों को लालच देकर उनके नाम पर फर्जी फर्में और बैंक खाते खुलवाता था. इसके बाद फर्जी ई-वे बिल और खरीद-बिक्री के दस्तावेज तैयार कर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का गलत लाभ लिया जाता था. बाद में सर्कुलर ट्रेडिंग, सराफा कारोबार, डिजिटल वॉलेट और हवाला नेटवर्क के जरिए रकम को इधर-उधर किया जाता था.

गिरोह के सदस्य नोटों के सीरियल नंबर तक को कोड भाषा की तरह इस्तेमाल करते थे, ताकि लेनदेन का पता न चल सके. पुलिस का कहना है कि 2017-18 से यह नेटवर्क सक्रिय था और कई लोगों के साथ मिलकर अस्तित्वहीन फर्मों के नाम पर फर्जी कारोबार किया जा रहा था. जांच में कुछ अन्य नाम भी सामने आए हैं, जिनकी भूमिका की पड़ताल की जा रही है.

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