आओ सुनाएं एक कहानी, एक राजा था एक… सीतापुर की रानी कोठी का पूरा सच; 90 साल बाद खुला ताला
उत्तर प्रदेश के सीतापुर की ऐतिहासिक रानी कोठी 90 साल बाद जिला प्रशासन के कब्जे में आ गई है. लगभग 100 करोड़ रुपये की नजूल भूमि पर बनी यह कोठी लंबे समय से विवादों में थी. ब्रिटिश काल में 30 साल की लीज पर दी गई यह जमीन 1936 में ही खत्म हो गई थी, लेकिन अब प्रशासन ने इसे खाली कराया. इसका समृद्ध इतिहास और शाही वास्तुकला इसे खास बनाती है.
उत्तर प्रदेश के सीतापुर की रानी कोठी इस समय सुर्खियों में है. नजूल भूमि पर बनी इस कोठी को 90 साल बाद जिला प्रशासन ने अपने कब्जे में लिया है. लंबे समय से इस कोठी में ताला लगा था, लेकिन अब नया ताला जिला प्रशासन का लगा है. अधिकारियों ने इस कोठी की कीमत करीब 100 करोड़ रुपये आंकी है. इस कोठी के लिए सरकार ने साल 1906 में जमीन 30 साल की लीज पर दिया था. यह लीज साल 1936 में ही खतम हो गई, लेकिन जमीन कब्जामुक्त नहीं हो सकी थी.
ये तो हुई सरकारी बात, अब जान लेते हैं कि सीतापुर के बट्सगंज स्थित इस ‘रानी कोठी’ का इतिहास क्या है और इसका महत्व क्या है? स्थानीय इतिहासकारों के मुताबिक साल 1906 में यह जमीन ब्रिटिश हुकूमत ने नवीनगर के राज परिवार को दी थी. नजूल भूमि (भूखंड संख्या 1568) कुंवर निहाल सिंह के नाम से 30 साल के लिए आवंटित हुई थी. तय हुआ था कि राज परिवार इस जमीन पर उद्यान लगाएगा.
राज परिवार ने बनवा लिया कोठी
नवीनगर स्थित इस जमीन का पट्टा मिलने के बाद कुंवर निहाल सिंह ने एक छोटा सा उद्यान बनाया और बाकी जमीन रियासत की महारानी कुंवरि पृथ्वीपाल को दे दी. फिर रानी ने इसी उद्यान में भव्य कोठी का निर्माण कराया. यह कोठी के निर्माण में रियासतकालीन वास्तुकला और शाही जीवन शैली की चित्रों में उकेरा गया था. आज भी इस कोठी की डिजाइन पर इसमें की गई कलाकारी लोगों के आकर्षण का केंद्र है.
नवी अहमद ने बसाया था गांव
ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक नवीनगर गांव करीब 700 साल पहले मुगल सल्तनत के तालुकदार नवी अहमद ने बसाया था. उस समय मुगलों के आधिपत्य में यह एक छोटी रियासत थी. बाद में कटेसर नरेश प्रताप बहादुर सिंह ने नवी अहमद को हराकर इस रियासत पर कब्जा कर लिया. राजा प्रताप बहादुर सिंह के पूर्वज राजस्थान से आकर सीतापुर में बसे थे. फिर 18वीं और 19वीं सदी में इस रियासत पर महारानी कुंवरि पृथ्वीपाल ने शासन किया. उनके शासनकाल में यहां कई नक्काशीदार मंदिर, विशाल शाही बावड़ी और इस भव्य ‘रानी कोठी’ का निर्माण किया गया था.
दहेज का सामान बनी थी रानी कोठी
ऐतिहासिक प्रसंगों के मुताबिक सीतापुर में कमलापुर के कसमंडा नरेश राजा दिनेश प्रताप सिंह की बहन सविता कुमारी उर्फ आभा रानी की शादी कटेसर रियासत के राजा जंग बहादुर सिंह के परिवार में हुई थी. उस समय कसमंडा नरेश ने यह रानी कोठी अपनी बहन आभा रानी को दहेज में दे दी. साथ में उन्हें नवीनगर रियासत भी दे दिया था. बाद में राजा जवाहर सिंह यहां आकर बसे और इसी कोठी को अपना ठिकाना बना लिया. उसी समय से इस कोठी पर उनके वंशजों का कब्जा था.
फिर क्यों हुआ विवाद?
राजा जवाहर सिंह के वंश दो रानियों से आगे बढ़ा, लेकिन वंशजों में इस कोठी पर मालिकाना हक का विवाद भी शुरू हो गया. आभा रानी और राजा की दूसरी रानी वीरप्रभा के बीच लंबी कानूनी व पारिवारिक लड़ाई चली. इस कानूनी लड़ाई में वीरप्रभा की जीत हो गई. अभी इस रानी कोठी पर रिटायर लेफ्टिनेंट कर्नल विक्रम शर्मा, मधुलिका त्रिपाठी और राजेंद्र कुमारी का कब्जा था.
90 साल बाद हटा कब्जा
सैन्य अधिकारी रहे विक्रम शर्मा के राजघराने से गहरे संबंध थे. विरासत के विवाद के चलते रानी कोठी पर उन्हीं का नियंत्रण भी था. इसी प्रकार हरीश त्रिपाठी की पत्नी मधुलिका त्रिपाठी कटेसर नबी नगर स्टेट के पूर्व तालुकदार के परिवार की कानूनी वारिस होने की वजह से दूसरी कब्जेदार थीं. चूंकि यह दोनों काफी सामाजिक और राजनीतिक रसूख वाले थे, इसलिए प्रशासन को इनका कब्जा हटाने में 90 साल का वक्त लग गया.